तेरहवीं/मृत्यु भोज: एक कुप्रथा जो दु:ख को कर्ज में बदल देती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि किसी घर में जब मृत्यु होती है तो उस परिवार के पास सबसे पहले क्या बचता है दु:ख या खर्च का डर? क्योंकि हमारे में मृत्यु के बाद शांति के नाम पर एक परंपरा चिपकी हुई है तेरहवीं/मृत्यु भोज/मृतक भोज।
कहा जाता है कि आत्मा की शांति के लिए भोजन/भोज कराना जरूरी है। पर जरा सोचिए आप कि क्या वाकई किसी आत्मा को भूख लगती हैं। क्या मरने के बाद किसी को खाने की जरूरत होती है? या ये सिर्फ समाज की बनाई एक कहानी है, जिसे हमने बिना सोचे समझे सच मान लिया है। आज हम बात करेंगे इसी प्रथा की जिसमें दु:ख के बीच भी दिखावा जरूरी माना जाता है, और जिसे दिखाने या यूँ कहे इस प्रथा को निभाने के लिए तो लोग कई बार कर्ज तक में डूब जाते हैं।
तेरहवीं/मृत्यु भोज का विचार बहुत पुराना है कई लोग तो कहते है कि हमारे पुरखें करते थें इसलिए हम भी करेंगे। पर पुरखें तो बहुत कुछ करते थें वे जमीन जोतते थे बैल से, वे बिना टी. वी., मोबाइल के रहते थे, वे इलाज झाड़-फूंक से करवाते थे। तो क्या हम आज भी वैसा ही करेंगे? समय बदलता है और हर प्रथा को तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए।
कहा जाता है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज आत्मा को शांति देने का एक तरीका है। आप जरा तर्क से सोचिए, अगर आत्मा कोई ऐसी ऊर्जा है जो शरीर छोड़ देती है तो उसे खाने की जरूरत कैसे पड़ सकती हैं। ऊर्जा ना तो रोटी खाती है और न दाल-चावल से शांत होती है। वैसे तो आत्मा की अवधारणा (Concept) अंधविश्वास है। फिर भी अगर मान लें कि आत्मा सच में अस्तित्व में है तो वो (आत्मा) किसी भोज से नहीं बल्कि अच्छे कर्मों से शांत होगी, और अगर आत्मा का कोई प्रमाण ही नहीं है तो फिर तेरहवीं/मृत्यु भोज किसके लिए?
सच्चाई तो यह है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज आत्मा की शांति के लिए नहीं समाज की संतुष्टि के लिए होता है, दिखावे के लिए होता है। गाँव-गाँव, शहर-शहर सभी जगह लोग कहते है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज नहीं की तो लोग क्या कहेंगे? यानि इंसान मरने के बाद भी समाज को खुश किए बिना शांति नहीं पा सकता। गरीब परिवार जिनके घर में कमाने वाला चला गया। वो लोग कर्ज लेकर तेरहवीं/मृत्यु भोज करवाते हैं। ताकि समाज उन्हें कंजूस या गलत ना कहें। ये (तेरहवीं/मृत्यु भोज ) श्रद्धा नहीं सामाजिक भय है। श्रद्धा वो होती है जो दिल से निकले। लेकिन जब हम किसी काम को 'लोग क्या कहेंगे' के डर से करते है तो वो श्रद्धा नहीं सामाजिक भय होता है। तेरहवीं/मृत्यु भोज यही है। एक ऐसा डर जो पीढ़ी दर पीढ़ी सौंपा गया है, बिना किसी सवाल के।
धर्म कहता है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज करो आत्मा को मुक्ति मिलेगी। लेकिन देखा जाए तो धर्म ग्रंथों में भी कहीं यह नहीं लिखा है कि सैकड़ों लोगों को बुलवाओ खाना खिलाओ, तेरहवीं/मृत्यु भोज करवाओ या रूपये खर्च करो। ये सब धीरे-धीरे बढती सामाजिक प्रतिस्पर्धा ने जोड़ा है। लोग अब शांति से ज्यादा प्रतिष्ठा दिखाना चाहते हैं। और यही (तेरहवीं/मृत्यु भोज ) वो बिंदु है जहाँ श्रद्धा दिखावे में बदल जाती है। आप जरा सोचिए कि जिस परिवार का सदस्य चला गया, वो पहले ही मानसिक रूप से टूटा होता है, दु:खी होता है। ऐसे में समाज उनसे कहता है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज कराओ, पंडित बुलाओ पूजा कराओ। पंडित लिस्ट देता हैं फला कपड़ा, फला दान, फला दक्षिणा, और ये सब मिलकर एक धार्मिक कारोबार बन जाता है।
धर्म के नाम पर जो पैसा खर्च होता है वो वास्तव में व्यापार में बदल गया है। पंडित कहते है कि तेरहवीं/मृत्यु भोज नहीं की तो आत्मा भटकेंगी। यह एक मनोवैज्ञानिक चाल है। भय का निर्माण करो और फिर उसी भय का समाधान भी करो। यह बहुत बड़ी साजिश है धर्म की। लेकिन कोई नहीं बताता कि कभी किसी ने वो भटकती आत्मा देखी भी नहीं है। वही कईं गांवों में देखा गया है कि जहाँ किसी की मृत्यु होती है और अगर घर वाले गरीब है तो वे पहले पैसे उधार लेने जातें है। क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगर तेरहवीं/मृत्यु भोज नहीं कराया तो समाज ऊंगली उठायेगा। सोचिये ऐसे में शांति कहा है? ये (कर्ज) तो दु:ख पर जुड़ी एक और पीड़ा है।
तेरहवीं/मृत्यु भोज जैसी प्रथाएँ दरअसल सामाजिक कोपिंग मैकेनिज्म से जुड़ी हुई हैं। मृत्यु के बाद लोग शून्यता महसूस करते हैं। तो कोई रिचुअल्स (Rituals) उन्हें उपदेश देता है कि ये एक मानसिक राहत का भ्रम होता है। लेकिन यही प्रथा दिखावे या दबाव में की जाती है तो ये एक मनोवैज्ञानिक शांति नहीं Trauma dipole बन जाती है।
विज्ञान सीधा कहता है कि मृत्यु के शरीर विघटित होता है और वो प्रकृति का हिस्सा बन जाता है। कोई आत्मा कोई तेरहवां दिन कोई अदृश्य भूख इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसलिए तेरहवीं/मृत्यु भोज को वैज्ञानिक सत्य नहीं कहा जा सकता, ये एक सिर्फ सांस्कृतिक आदत है या यूँ कहे तो एक सांस्कृतिक प्रथा है।
आइये जानते है कि कानून क्या कहता है?
भारत में सरकार ने कुछ जगहों पर इस प्रथा (तेरहवीं/मृत्यु भोज ) पर रोक लगाने की कोशिश की है। सबसे पहला और ठोस उदाहरण है राजस्थान। वर्ष 1960 में राजस्थान मृत्यु भोज निवारण अधिनियम (Rajasthan Prevention of Mrityu Bhoj Act) पास किया गया। इस कानून के तहत कोई व्यक्ति अगर तेरहवीं/मृत्यु भोज करवाता है या लोगों को बुलाता है तो उस पर जुर्माना या एक साल तक की सजा हो सकती है। ये कानून इसलिए बनाया गया क्योंकि राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में लोग तेरहवीं/मृत्यु भोज पर हजारों रूपये खर्च करते थे। भले ही उनके पास दो वक्त की रोटी न हो। तेरहवीं/मृत्यु भोज के लिए कर्ज लेते थें। कानून तो बन गया फिर भी लोगों की सोच नहीं बदलीं।
आज भी लोग चोरी छुपे वही करते है जो समाज उनसे चाहता है। क्योंकि असली जंजीर कानून की नहीं मान्यता की होती है। जब तक मन से ये अंधविश्वास नहीं टूटेगा कि तेरहवीं/मृत्यु भोज ना करने से कुछ बुरा होगा तब तक ये कुप्रथा खत्म नही होगी।
किसी प्रियजन को याद करने के अनगिनत तरीके हैं। जो तेरहवीं/मृत्यु भोज से कही ज्यादा सार्थक है। आप अपने प्रियजन की याद में किसी गरीब को कपड़े दे सकते हैं। भूखों को भोजन करा सकते हैं। किसी बच्चे की फीस भर सकते है या किसी असहाय की मदद कर सकते हैं। यही असली श्रृद्धांजलि है। मरने वाला व्यक्ति अगर जिंदा होता तो सोचिए कि वो चाहता/चाहती कि उसके नाम पर पैसा उड़ाया जाए या वो चाहता/चाहती कि वो पैसा किसी जरूरतमंद के काम आए।
तेरहवीं/मृत्यु भोज की ये प्रथा सिर्फ एक दिखावा बन गया है। ये ना आत्मा को शांति देता है और ना परिवार को सूकुन। ये बस दिखावा है। बल्कि ये सिर्फ समाज के डर धर्म के व्यापार और अंधविश्वास के जड़ का हिस्सा है। तेरहवीं/मृत्यु भोज की आर्थिक बोझ और अंधविश्वास पैदा करती है और कुछ नहीं। हालांकि आज युवापीढ़ी में लोग सवाल उठा रहे हैं कि तेरहवीं/मृत्यु भोज नहीं होना चाहिए ये एक कुप्रथा है। अगर भाव श्रद्धा का है तो खर्च से क्यों मापा जाए।
कई समझदार परिवार अब तेरहवीं/मृत्यु भोज की जगह अब दान को चुनते हैं। जरुरतमंदों की मदद करते हैं। कई बच्चे अपनी पिता की याद में बल्ड डोनेशन कैम्प कराते हैं। तो कई लोग गरीबों को भोजन कराते हैं, बिना किसी दिखावे के। यही वो बदलाव है जिसकी हम सभी को जरुरत है।
आपकी इस कुप्रथा के बारे क्या विचार है कमेंट बॉक्स में हमारे साथ अवश्य साझा करें। धन्यवाद🙏

